पलछिन-पलछिन की खुशियां हैं

जयपुर आकाशवाणी पर मैं बच्चों के लिए लिखता था। 1994 में मुझसे बच्चों के लिए जंगल-मंगल थीम पर कुछ लिखने को कहा गया। मैंने यह लंबी कविता लिखी

क बात पूछूं मैं बच्चों
सच-सच मुझे बताना
मंगल का क्या मतलब होता
अच्छी तरह जताना
क्या होता है शब्द, बोलना
और मौन बन जाना
काना बाती कुर्र और फिर
खिल-खिल-खिल हंस जाना
जंगल में मंगल का होना
फूलों का खिल जाना
सांय-सांय सुर ताल हवा के
झींगुरनी का गाना

ये कुछ ऐसी बातें हैं
जिनको लोकोक्ति कहते हैं
कथा कहानी और किस्सों में
अक्सर हम लिखते रहते हैं
ऐसी ही एक बनी कहावत
जंगल में मंगल कहलाई
जिसने जानी उसने मानी
खुशियों की गागर छलकाई
कथा कहानी का प्रचलन था
चौपालों की बात और थी
पूछा करते लोग पहेली
कव्वइयों की रात और थी
बच्चे रोज इकट्ठे होकर
लुक्का छिप्पी का खेल खेलते
कभी कोई बन जाता राजा
खेल-खेल में सजा झेलते
सारी ये जो दुनियादारी
नानी से सीखा करते थे
नहीं सताते कभी किसी को
झूठ बोलने से डरते थे,
किन्तु आज की बात और है
सारा आलम बदल गया है
लोकोक्तियां भुलाई सबने
अर्थ सभी का बदल गया है
जंगल में मंगल अब कैसा
जंगल सारे उजड़ गए हैं
वृक्ष देख रोना आता है
पशु-पक्षी भी बिसर गए हैं
शिक्षा भूले रामायण की
कथा भागवत भूल गए हैं
भूले मनु की मान पहेली
कथा राम की भूल गए हैं

एक कथा है आदिकाल की
बहुत पुरानी बात हो गई
ध्यान लगाकर सुनो कहानी
एक दिन में रात हो गई
कुछ ही क्षण को हुआ अंधेरा
जैसे काली बदली छाई
फिर बादल ने रंगत बदली
सूरज ने सूरत दिखलाई
श्वेत रंग का घोड़ा बनकर
बादल सरपट दौड़ा आया
गीदड़ के घर शादी आई
जंगल से संदेश लाया
राम चिरैया का बाजा है
मेंढ़क राग सुनाएगा
चंदा मामा को बुलवाया
मंगल तारा आएगा
सूरज तुमको भी चलना है
सभी मण्डली आएगी
जंगल में मंगल तब होगा
इंद्र सभा जुड़ जाएगी
पहले तो सूरज हंस बोला
कैसी नादानी करते हो
मुझे ले चलोगे शादी में
कैसी नासमझी करते हो
चंदा तो फिर भी आ सकता
और तारे भी आ जाएंगे
मेरा चलना कभी न संभव
अंधियारे छा जाएंगे।
कतर कतरनी सी जुबान तो
कुछ भी बोला करती है
कब किसको क्या कुछ कहना है
कभी न तोला करती है
बादल ने जिद पकड़ी भारी
चलना सूरज की लाचारी
युक्ति सोचने लगे सभी तब
कैसे हो इसकी तैयारी
झटपट गौरेया को भेजा
और हवा को बुलवाया
सूरज को लेकर चलता है
यह ही सबके मन भाया
हवा लहर-लहर कर बोली
चले चलेंगे सूरज दादा
युक्ति मैं बतलाऊं
करती हूं यह पक्का वादा
नन्हें-नन्हें बिखरे बादल
एक जगह आकर मिल जाओ
बनो पहाड़ ढ़को सूरज को
यह अपना करतब दिखलाओ
मैं भी चंचलता छोड़ूंगी
टस से मस न होऊंगी
जहां खड़ी हूं वहीं रहूंगी
बादल को ना ढोऊंगी
बता हवा ने अपना वर्तुल
एक-एक बादल ला घेरा
और बनाया एक आवरण
लगा-लगा सूरज का फेरा
तितली के रंगीन परों पर
बैठ चली तब पवन यहां से
जंगल में क्या हाल चल रहा
आऊं देख मैं अभी वहां से।
दादा तुमको क्या समझाऊं
चलने की अब करो तैयारी
चलना तो आखिर होगा ही
क्यों दिखलाएं हम लाचारी
यह सारा जंगल अपना है
हमसे ही प्राणी का जीवन
सारी पृथ्वी चले हमी से
हमको देना सबको जीवन
एक खुशी छोटी हो चाहे
जंगल में अब ब्याह रचाएं
हम सबका तो फर्ज यही है
उनके संग साथ हो जाएं
तुम हो, मैं हूं, और ये बादल
अपना यह सारा आकाश
चंदा, तारे टिम-टिम करते
फैला रहे हैं खूब प्रकाश
इस पृथ्वी पर रहने वाला
एक-एक प्राणी अपना है
भेष अलग है, शक्ल पृथक है
सृष्टि की रचना सपना है।
अच्छा-अच्छा बंद करो अब
अपना यह लम्बा उपदेश,
सभी चाहते चला चलूंगा
अपना बदलूंगा मैं भेष
बादल ने झट ढका सूर्य को
सूरज ने कपड़े बदले
तीनों साथ-साथ चल करके
जंगल में तब जा पहुंचे
कैसी थी जंगल की रौनक
वर्णन जिसका मुश्किल था
बंदनवार बने सजते थे
सारा आलम झिलमिल था
गीत-संगीत अजब था
पत्ता-पत्ता लहराता
गीदड़ की शादी में भइया
सूरज है आने वाला
पलछिन-पलछिन की खुशियां हैं
पलछिन की है दुनियादारी
पलछिन में ही रात हो गई
बात बनी पलछिन में सारी
जहां सभी हिल मिलकर रहते
भेद न कोई होता है
बच्चों याद सदा तुम रखना
जंगल में मंगल होता है।scan-29

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