समृद्धि के सूरज चंदा, खुशियों के तारे भर दो

आओ आज सुनाएं बच्चों, अद्भुद एक कहानी।
नए दौर के जीवन में तो, है यह बात पुरानी।
बहुत सुने हैं तुमने किस्से, जानी बहुत तरह की बात।
पर इसको भी सुनो ध्यान से, ये बीते इतिहास की बात।
तुमने पढ़ा सुना है बच्चों, अपने देश के बारे में।
राजाओं के जीवन देखे, और झांक लिया चौबारे में।
महापुरुष भी पहिचाने हैं, पढ़कर नाम किताबों में।
जान लिए कितने योद्धा भी, और शहीद सितारों में।
पर क्या तुमने यह सोचा है, किया विचार अकेले में।
कैसे थे वे लोग देश के, जीवन जिया अधेले में।
तुम सोचोगे नया शब्द है, क्या है अर्थ अधेले का।
दादी-नानी किसी से पूछो, जाकर काम अधेले का।
आम आदमी कैसा था तब, भारत में रहने वाला।
क्या खाता था, क्या पढ़ता था, कितना था हिम्मत वाला।
कपड़े क्या पहना करता था, कैसे घर में रहता था।
आंधी, पानी, सर्दी, गर्मी, कैसे-कैसे सहता था।
लकड़ी के कच्चे मकान थे, घास फूस की छत बनती थी।
जीवन का उद्देश्य सत्य था, भारत मां की छवि बनती थी।
केवल एक गुरु ने ही तो विधापूर्ण कराई थी।
इतना कागज, इतना लेखन, पहले लोग नहीं करते थे।
केवल मौखिक कहते-सुनते, जीवन में गुनकर रखते थे।
याददाश्त उनकी पैनी थी, जीवन दृष्टि सयानी थी।
प्रेम और सद्भाव बरतना, उनकी यही निशानी थी।
भाषाओं की लिस्ट नहीं थी, जैसे आज कईं भाषाएं।
संस्कृत, पाली और थी प्राकृत जिसमें सारे ज्ञान समाए।
कैसे थे वे लोग जिन्होंने भारत मां को प्यार किया।
भारत की मिट्टी को पूजा, मिट्टी से ही तिलक किया।
घर के द्वार खुले रहते थे, कौन न जाने कब आ जावे।
घर का तो कार्य यही है, आगंतुक अतिथि कहलाए।
तुमने नाम सुना है बच्चों, मेगस्थनीज और फाह्यान का।
जग को जा बतलाया जिनने, आंखों देखा हाल यहां का।
निर्भय लोग यात्रा करते सड़कें खतरों से खाली थीं।
ताले नहीं लगाता कोई, और न कोई रखवाली थी।
यूं तो चोर उचक्के भी थे, होंगे और बहुत से दोष।
पर आम आदमी के जीवन में इनसे कभी न आया रोष।
जैसी करनी वैसी भरनी, दण्ड विधान देश का था।
जन-जीवन में शान्ति व्यवस्था करना काम राज्य का था।
आम आदमी तो बस अपनी रीति-नीति पर चलता था।
आस्था और विश्वास सभी में श्रद्धा लेकर चलता था।
शायद याद तुम्हें हो घटना मध्य युगीन कहानी की।
अलाउद्दीन खिलजी शासक था दिल्ली राजधानी थी।
काजी लाया एक सूचना चोरी और बेईमानी की।
दिल्ली का बाजार है बिगड़ा खबर नहीं ईमानी की।
आम आदमी लुटे यहां पर नहीं बादशाह को यह भाया।
भोली प्रजा भरोसे किसके? खिलजी ने तेवर दिखलाया।
फौरन भेज दिया दारोगा बेईमानों की करो पिटाई।
खत्म लूट यों हुई वहां पर जनता ने भी राहत पाई।
बहरहाल यह समय की घटना ऐसी और अनेक अजब है।
जो रचती इतिहास समय का करतब उनके बड़े गजब है।
लोग पुराने बहुत सुखी थे सीख बड़ों की बात पर चलते थे।
वेद, पुराण शास्त्र की बातें रामायण गीता सुनते थे।
आपस के झगड़े टण्टे भी अगर कभी भी हो जाते थे
फौरन पास बड़ों के जाते आनन फानन सुलझाते थे
किन्तु आज की आपा-धापी छोटे और बड़ों का चक्कर
पैसे के पीछे सब पागल, मार रहे आपस में टक्कर।
कितना दुख कितनी दरिद्रता धीरे धीरे फैल रही है।
आज निरीह हुई यह जनता सब कुछ सब कुछ झेल रही है।
सोचो यदि मेगस्थनीज और फाह्यान कोई आ जाए।
कैसा भारत देश हमारा? दुनिया को वह क्या बतलाए।
तुम ही एक मात्र आशा हो बच्चों अब इस देश की।
भारत मां को वही छवि दो सौगन्ध तुम्हें इस देश की।
बिना ताले के घर हो बच्चों बिन ताले के मन कर दो।
समृद्धि के सूरज चंदा, खुशियों के तारे भर दो।

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