चलती रहे यह जिंदगी

भारत में छोटे परिवहन का सबसे सुलभ साधन है रिक्शा। इस भागती-दौड़ती जिंदगी में जहां वाहनों की रेलमपेल है उसमें रिक्शा फिट नहीं बैठता। रिक्शा इन वाहनों के साथ लय और ताल नहीं बिठा पा रहा। लेकिन यह गरीब का पेट भरने का भी एक साधन है। रिक्शाचालों की परेशानियों पर मैंने 2009 में यह पीस लिखा था जो नई दुनिया में प्रकाशित हुआ था।

झींवाराम भारत-पाक सीमा पर बसे बाड़मेर जिले से छह सौ किमी का सफर तय करके राजधानी जयपुर में साइकिल रिक्शा चलाकर अपने परिवार की रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहा है। उसे इस बात का कोई मलाल नहीं है कि पेट की आग ने उसे अपने परिवार से इतना दूर कर दिया है। उसे सुकून है कि परिवार से दूर सही लेकिन जिंदगी की रफ्तार चल तो रही है, अपने बीवी-बच्चों के लिए दो जून की रोटी का इंतजाम तो हो रहा है।

भारत में साइकिल रिक्शा देश के हर कोने-कूंचे में मिल जाएंगे। रोजगार की कमी के कारण अधिकतर लोग ये पेशा अपना रहे हैं। फैक्ट्रियों के बंद होने, उद्योंगों में छंटनी के कारण कई लोग रिक्शा चलाने को अपनी आय का जरिया बनाने को बाध्य हुए हैं। तेजी से महानगर का रूप लेते हुए जयपुर शहर में रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पालने वाले सैकड़ों लोग हैं।

भरतपुर के लाल मुहम्मद के अनुसार वह रिक्शा इसलिए चलाता है कि इसमें कोई बंदिश नहीं है। काम सीखने की भी जरूरत नहीं पड़ती। जब जी चाहा सवारी ढोली जब चाहा आराम कर लिया। लाल मुहम्मद ने अपने दो बेटों व एक बेटी की शादी रिक्शा चलाने से होने वाली आय से ही की है। रिक्शा भी वह किसी और का चलाता है। रिक्शा मालिक को वह रोज 20 रुपए किराया देता है जो उसे हर हफ्ते अदा करना पड़ता है। लाल मुहम्म्द बताता है कि वह रोजाना 50-200 रुपए तक कमा लेता है लेकिन कभी कभी तो बिल्कुल कमाई नहीं होती। वहीं पटना का रहने वाला राकेश बताता है कि वह हर दो तीन माह में पैसा इकट्‌ठा करके घर भेजात है।

कमाई ऊंट के मुंह में जीरा 

लाल मुहम्मद व अधिकांश रिक्शे वालों की तरह उसकी भी वही कहानी है। रिक्शा मालिक को उसे भी 20 रुपए रोज के देने होते हैं जो वह आठ-दस दिन में अदा करता है। कमाई तो है ही ऊंट के मुंह में जीरा। रोज 100-150 रुपए कमाई होती है। रहने खाने के इंतजाम, रिक्शे के किराए, रिक्शे में होने वाली छोटी-मोटी टूट-फूट का खर्चा भी जेब से ही निकालना पड़ता है। इसके बाद जो बचता है वह घर भेजना होता है।

बीड़ी पीने का शौक रखने वाला लाल मुहम्मद बताता है कि कई रिक्शाचालक नशे की लत का शिकार हैं। इनमें अधिकतर अविवाहित रिक्शा चालक हैं। चरस, गांजा, शराब के वे आदि हो चुके हैं। शहर में शाम को रेलवे स्टेशन के सामने व दाे-तीन जगह सरकार का वाहन आता है जिसमें पांच रुपए की पर्ची कटाने पर एक वक्त भोजन मिल जाता है। सोने की चिंता नहीं उसके लिए फुटपाथ है ही और पेसा बचाने की न तो समझ है और न जरूरत जिसकी चिंता की जाए। लाल मुहम्मद के अनुसार पुलिस भी इन नशेड़ी रिक्शा चालाकों को धरते-पकड़ते थक गई, लेकिन इनकी आदत में कोई सुधार नहीं होता। जहां तक रिक्शाचालकों के परिवार वालों की बात है तो कमाई का पूरा दारोमदार पुरुषों पर ही है।

पेट की आंतें तक खिंच जाती हैं

इनके बच्चे भी कम ही स्कूल जाते हैं और कुपोषण का शिकार हैं सो अलग। एक रिक्शाचालक सुरेश ने बताया कि रिक्शे कई हैं और सवारियां कम होने से कई बार सुबह तो वह खाली पेट ही सवारियां ढोता है। करीब 90 किलो के रिक्शे को खाली पेट चलाने से बहुत ताकत लगानी पड़ती है जिससे पेट की आंतें खिंच जाती हैँ। ऐस करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। सरकार की ओर से कोई रेट लिस्ट नहीं होने के कारध सवारियों से पैसों को लेकर झगड़ा होना आम बात है।

गरीब रिक्शेवालों का बीमा भी नहीं होता इसलिए दुर्घटना होने पर क्लेम भी नहीं मिलता। गतिशीलता व स्वच्छ पर्यावरण नीति-नियंताओं के लिए परिहन प्रणाली जहां सबसे चिंता वाला विषय है, वहीं आधुनिक परिवहन प्रणाली में रिक्शे सकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि सुविधाएं नहीं होने के कारण परिवहन के ये साधन अन्य वाहनों के लिए सकुड़न व असुविधा का सबब बन गए हैं। प्रदूषण रहित इस सस्ती व शानदार सवारी को सरकारी प्रोत्साहन और मदद की जरूरत है। सरकार ने इनके लिए विश्वकर्मा गैर संगठित कामगार अंशदायी पेंशन योजना चला रखी है। इसमें 60 की उम्र होने पर रिक्शाचलक को पेंशन मिलने लगती है।

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