चंदा को हर बच्चा प्यारा, मेरा भी यह राज दुलारा

जहां हम बच्चों में जीवन देखते हैं, उत्साह देखते हैं वहीं अन्य जीव हमें स्वतंत्र एवं उन्मुक्त जीवन जीने की ओर इशारा करते हैं। स्वावलम्बन उनका गुण है। उनका कलरव, गुंजन हमारे जीवन में स्फूर्ति का नव संचार करता है। हमारी संस्कृति में वनों के संरक्षण एवं विकास के साथ-साथ वन्य जीवों के संरक्षण को भी महत्व दिया गया है, परन्तु पिछले कुछ दशकों में मानव जाति का क्रूर व्यवहार वन्य जीवों के साथ हुआ है। वन्य जीवों और बच्चों के लिए हरियाली सबसे आवश्यक है। (मेरी यह कविता 1994 में जयपुर आकाशवाणी से प्रसारित हुई थी, मेरी ही आवाज में) 

फुर्सत पा सूरज चुपचाप, आ बैठा बरगद के पास।
बोला हे वृक्षों के दादा, भूल गए क्या अपना वादा।
तुम तो इनमें सबसे बड़े हो, कुछ तो बोलो चुप खड़े हो।
पूछ रहा हूं तुमसे भाई, क्यों न तुमने बात निभाई।
पेड़-पेड़ क्यों मुर्झाया है, इसका ध्यान नहीं आया है।
क्रोधित हुआ सूर्य झल्लाया, उसे बहुत ही गुस्सा आया।
हरियाली का नाम नहीं है, हरी घास भी कहीं नहीं है।
बहुत दिनों से चंदा आकर, करता यही शिकायत गाकर।
नहीं कहीं उद्यान दीखता, फूलों भरा प्रभात दीखता।
चंदा को हर बच्चा प्यारा, मेरा भी यह राज दुलारा।
बोलो उसको और क्या दूं, कह दो उसको वही बतला दूं।
चारों तरफ उजाड़ पड़ा है, सूखे तन का वृक्ष खड़ा है।
कैसे चल पाएंगे बच्चे, खेलेंगे जब पांव से नंगे।
कोमल-कोमल मन को उनके, घायल कर देंगे ये तिनके।
बरगद नीची गरदन करके, आंखों में पानी भरकर के।
बोला सूरज से विनती करके, क्षमा करें प्रभु मुझे दया कर।
दोष नहीं इसमें मेरा है, नई हवा ने आ घेरा है।
जहां कभी पूजा होती थी, वृक्षों की दुनिया होती थी।
पीपल, आम, आंवला सारे, सबके सब हैरान बिचारे।
बिना खौफ हम काटे जाते, नहीं किसी को अब हम भाते।
लोग यहां अब दुष्ट हो गए, हरियाली से रुष्ट हो गए।
कभी पालते हमें शिशुवत, अब करते व्यवहार पशुवत।
जहां देखते वसुधा खाली, हरियाली जिस पर मतवाली।
कांट-छांट झटपट कर देते, हरीतिमा नष्ट कर देते।
फौरन प्लान बनवा लेते हैं, भव्य भवन बनवा देते हैं।
कैसा बुरा जमाना आया जिसने बच्चों को भी रुलाया।
बाग-बगीचे यहां न हरषें, बच्चे हरियाली को तरसें।
नेत्र ज्योति जिनकी फीकी है, ऐनक से दुनिया जीती है।
छोटे-छोटे बच्चे प्यारे, शुद्ध वायु को तरसें सारे।
अरे हरियाली तो जीवन सार, हरियाली में शक्ति अपार।
भूल गए यहां रहने वाले इसीलिए जीवन के लाले।
पड़ते हैं पैरों में छाले, दुःखी हुए हैं बच्चों वाले।
इसीलिए चंदा रोता है, व्यथा हृदय की वह कहता है।
आखिर तो बच्चों का मामा, उन्हें बनाएगा यह गामा
मैं तो प्रभु अब हार गया हूं, पेड़-पेड़ के द्वार गया हूं।
ढांढ़स उनको खूब बंधाता, मेहनत से मैं नहीं अघाता।
किन्तु पेड़ अब नहीं मानते, खुद मरने की जिद ठानते।
कहते अब हम स्वयं मरेंगे, वसुंधरा पर नहीं उगेंगे।
चिंता हुई सूर्य को भारी, सुनकर पेड़ों की लाचारी।
दुखी हुआ बरगद से बोला, धर्म भेद जीवन का खोला।
ऐसा नहीं सोचते भाई, बुद्धि तुम्हारी क्यों पथराई।
तुम तो अपना धर्म निभाना, संकट से तुम मत घबराना।
लोग अभी तो भूल रहे हैं, धन से जीवन तोल रहे हैं।
पर बच्चे तो अपने बच्चे, यह तो अपनों जैसे बच्चे।
हमसे ये रिश्ता रखते हैं, जब भी सुना यही कहते हैं।
सूरज जैसा हम दमकेंगे, चंदा सा हम भी चमकेंगे।
ध्रुवतारे सा अटल बनेंगे, बादल बन उन्मुक्त रहेंगे।
बच्चों की यह प्यारी बातें, मन को छूने वाली बातें।
भला कौन बिसरा पाएगा, किसको नहीं प्यार आएगा।
इनके लिए तुम्हें यह करना, हरियाली से पृथ्वी ढ़कना।
हरियाली है तो बच्चे हैं, बच्चे हैं तो हरियाली है।
दोनों को पर्याय बना दो, एक दूजे को अर्थ बता दो।
देर हुई अब मैं जाता हूं, भोर सृष्टि की करवाता हूं।
तभी धूल सी उड़ती दीखी, पशुओं ने आ रेखा खींची।
ठहरो-ठहरो जग के नाथ, हमें चाहिए थोड़ा साथ।
कैसे जीवन यहां बचाएं, कहां रहें क्या भोजन खाएं।
जहां, जहां वन काटे जाते, वन्य जीव बेघर हो जाते।
हरियाली नहीं रहने पाती, पशुओं की दुनिया मिट जाती।
कैसे हम संरक्षण पाएं, कुछ तो आप उपाय बताएं।
हाथ जोड़ पशु खड़े हुए थे, रोक रास्ता अड़े हुए थे।
सूरज की देखी लाचारी, बरगद ने झट युक्ति विचारी।
कहा सभी पशुओं से आकर, यह विनती है सुनो कृपा कर।
हुआ गजर का समय अभी तो, रोकें नहीं अभी प्रभु को।
वरना अनर्थ हो जाएगा, सूरज निकल नहीं पाएगा।
प्रश्न करेंगे हल हम पहला, धरती होगी सस्य शामला।
जंगल के हम वृक्ष बिचारे, वन्य जीव सारे के सारे।
करें प्रतिभा मिलकर भाई, अब न सहेंगे और कटाई।
क्षति जो हमको पहुंचाएगा, बच न यहां से जा पाएगा।
वन में विचरण जीव करेंगे, हरी घास भी खूब चरेंगे।
बच्चों के घर-घर उद्यान, बनवाएंगे यह बना विधान।
वृक्ष-वृक्ष यह मंत्र जपेगा, तभी क्रूरता तंत्र भगेगा।
हरियाली चहूं दिशा रहेगी, बच्चों की दुनिया चमकेगी।
वन्य जीव भी जिया करेंगे, सुख की सांसे लिया करेंगे।

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