जानिए क्या हैं सफलता के गूढ़ मंत्र

सफलता है क्या, मिलती कैसे है, क्या गणित है इसका। हर युवा की धड़कन सफलता की मुन्तजिर होती है। कर्म में कुशलता की प्राप्ति ही एकाग्रता की परिणति है। इसी पर मैंने एक लेख लिखा जो 1994 में जयपुर आकाशवासी से प्रकाशित हुआ था। – 

फलता शब्द के आकर्षण से छोटे-बड़े हम तभी परिचित हैं। विश्व के इतिहास में सफलता के कीर्तिस्तम्भ स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। पर ये किर्तीस्तम्भ क्या सभी को आसानी एवं सरल भाव से उपलब्ध हो जाते हैं? क्या मात्र सफलता से ही इसका सृजन, इतिहास के स्वर्णिम पक्षों में स्थान पा जाता है? ये कुछ सवाल हैं जिन पर आज के मेरे युवा साथियों को अवश्य ही गंभीरता से विचार करना चाहिए।

सफलता की मुन्तजिर हर धड़कन

साथियों, हर युवा हृदय की एक-एक धड़कन, जीवन की इस दौड़ में सफलता की मुन्तजिर होती है। भविष्य का सुनहरा ताना-बाना उसके बढ़ते हुए एक-एक कदम पर सफलता की सीढ़ियां चढ़ना चाहता है। वह देखना चाहता है अपने परिवेश को वांछित सुख-समृद्धि के झूले में झूलता हुआ।

हथेली पर सरसों उगाने वाली मनोवृति घर कर गई

भविष्य में सफलता प्राप्ति की इसी लिप्सा में लिप्त हुआ मन व्यक्ति से अनेक हास्यास्पद की तुक कराता है। परीक्षार्थी परीक्षा में सफलता के लिए अनेक मनोतियां मनाते हैं। कईं तो मात्र सिफारिश के सहारे से ही सफलता प्राप्ति का भ्रम पाले रहते हैं तो अनेक ऐसे भी हैं जो परीक्षा के समय अनैतिक कार्य करके ही सफल हो जाना चाहते हैं। इसी प्रकार चाहे व्यापार हो अथवा अन्य कार्य सभी क्षेत्रों में हथेली पर सरसों उगाने वाली मनोवृत्ति घर कर गई है। दूसरे शब्दों में यदि यह कहा जाए कि कार्य के प्रति निष्ठा, कुशलता एवं समर्पण की भावना का प्रायः लोप हो गया है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। हम चाहते तो हैं कि हमें वांछित कार्य में सफलता मिले किन्तु सफलता का रहस्य क्या है, यह कैसे प्राप्त होती है, नहीं जानते और न ही इस पर कभी विचार करते हैं।

तो फिर भाग्य ही दोषी 

यहां मैं अपने एक ऐसे मित्र की चर्चा करना चाहूंगा जिसने किसी भी काम में सफलता अथवा पूर्णता का मुंह नहीं देखा। धीरे-धीरे उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया। वह हर समय भाग्य को ही दोषी ठहराता। कभी ईश्वर को दोष देता तो कभी अपने अभिभावकों को। मुझे अपने मित्र की इस मनोवृत्ति पर दुख होता। मैंने उसे समझाने की चेष्टा की कि तुम हर क्षण अपने विचारों को बदलते क्यों रहते हो? जो भी काम हाथ में लेते हो उसे पूरा किए बिना छोड़ देते हो और दूसरा काम शुरू कर देते हो। आखिर ऐसा क्यों? मेरी बात का वह यही जवाब देता कि उस काम में जिसे मैंने छोड़ा, मुझे सफलता नहीं मिल सकती थी और इसीलिए मैंने उसे बीच में ही छोड़ दिया। जब मैं उससे यह पूछता कि तुमने कैसे जाना कि उस काम में तुम सफल नहीं हो सकते? यह बात तुमसे किसने कही? उसका उत्तर होता- ‘‘मन ने’’। यह मेरे मन ने मुझसे कहा कि मैं उस काम को छोड़कर इसे शुरू करूं।

मन क्या है ?

बड़ी गम्भीर समस्या है। मन क्या है? यह न शस्त्र है, न अस्त्र है। यह तो मन है और बड़ा विचित्र है। हम प्रपात देखते हैं, उसका वेग, उसकी ऊंचाई देखते हैं, उसकी सुन्दरता देखते हैं। मगर हम उसका उद्गम स्थल नहीं देखते। कहीं बहुत दूर से बहती हुई जल की धारा प्रपात में बदल जाती है। इसी तरह जो भी हम हैं अच्छे-बुरे, उसके पीछे हमारा मन है। मन तो दर्पण है और दर्पण के सामने हैं हम। अगर यह दर्पण तड़कता है तो हम वैसे ही नजर आएंगे जैसे कि यह दर्पण, यानी कि मन है।

मुश्किल है मन की थाह लेना 

यह तो मन है जो उड़ता भी है और विचरण भी करता है। ऐसी जगह का, जहां कोई जा नहीं सकता। मन की थाह लेना मुश्किल है। मन कल्पना शक्ति का स्रोत है, मन संकल्प शक्ति का स्रोत है। कवियों ने तो मन से बड़ा किसी को माना ही नहीं है, यहां तक कि ईश्वर को भी मन ही माना है। यह सही है, मन जिसका पावन है उसे और क्या चाहिए? किन्तु क्या यह मन हमारे वश में है? क्या मन को बांधा जा सकता है? जी, हां मन के लिए कहीं जाना जब असंभव नहीं तो मन को तो फिर बांधना ही पड़ेगा न। समझाना पड़ेगा और जब हम समझाएंगे मन को तो मन को एकाग्र करना होगा और यही एकाग्रता हमें पहुंचाएगी सफलता की सीढ़ी तक। सफलता इतनी आसानी से नहीं मिलती। यह तो मन को एकाग्र करने से ही मिलती है। मन की एकाग्रता एक साधना है और यही साधना हमें पहुंचाती है सफलता तक। यह सफलता वही बात है जो बिना कर्म के बिना लगन के नहीं मिलती। इसीलिए कहा गया है कि मन को एकाग्र करो, तभी कुछ कर पाओगे।

ध्यान लगाएंगे तो शोर नहीं सुनाई देगा 

जब आप अपने मन को एकाग्र करेंगे तो आपको किसी तरह का कोई शोर सुनाई नहीं देगा और आप को अपनी परीक्षा ही नजर आएगी। मछली की आंख की तरह। आप अपनी किताब में नीरत हो जाइये और तब आपको मिलेगी सफलता और तब यह बात सार्थक होगी कि मन की एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है। जी, हां ये लोग जो दिए की मंद रोशनी में, सड़क पर बत्तियों के नीचे पढ़ते थे वे लोग सबसे ज्यादा फल भोगते थे, अपनी मेहनत का। वे लोग जो पढ़ने के लिए पैदल कोसों चलकर जाते थे, नदी तैरकर पार करते और तब पाठशाला पहुंचते थे। स्व. श्री लालबहादुर शास्त्री ऐसे ही एक उदाहरण हैं जो भारत जैसे विशाल देश के प्रधानमंत्री बने। उनके पास मन ही तो था जो एकाग्र हो गया था वरना यह संभव न था। इसीलिए कहते हैं कि कुछ कर गुजरने के लिए मौसम नहीं मन चाहिए।

हममें से अनेक इस बात को कह सकते हैं कि आज का माहौल गीता के योग दर्शन को सार्थक करने में सहयोगी नहीं। चारों तरफ बढ़ता हुआ शोर शराबा, ध्वनि प्रदूषण मन की एकाग्रता में बाधक है। अतः हमें यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि मन को वश में किए बगैर हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। भारतीय दर्शन में मन को वश में करने के लिए योग की अनेक व्याख्याएं की गई हैं और एकाग्रता से जब चंचल मन वश में हो जाता है तब यही एकाग्रता सफलता की कुंजी बन जाती है। उसके बाद हमारे सामने कैसी भी समस्याएं आएं, कैसे भी दुरुह कार्य क्यों न आएं, हम उनका समाधान एकाग्रचित होकर, एकनिष्ठ होकर कर पाएंगे क्योंकि जब हम मन के प्रति एकाग्र हो जाएंगे तो कर्म के प्रति भी एकाग्र हो जाएंगे। कर्म के प्रति एकाग्र होते ही हमें वह कौशल, वह कुशलता, वह महारथ हासिल हो जाएगी जिसके द्वारा कर्म निपष्पादित होता है और सफलता प्राप्त होती है। गीता में कहा गया है – ‘‘योगः कर्मसु कौशलम्’’ अर्थात् कर्म में कुशलता की प्राप्ति ही एकाग्रता की परिणति है।

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