जानिए सिजेरियन क्यों करते हैं डाक्टर

हते हैं महिला जब बच्चे को जन्म देती है तो यह उसका भी दूसरा जन्म होता है। जहां विदेशों में डिलीवरी का बहुत महंगा बीमा होता है वहीं भारत में इसको लेकर बने निमयों की पालना तक नहीं होती। कई बार पेनलैस डिलीवरी के लिए महिलाएं नॉर्मल डिलीवरी की बजाए सिजेरियन का ऑप्शन चुनती हैं। कभी-कभी तो बड़े घरों में मुहूर्त के लिए सिजेरियन को चुना जाता है। साल 2010 में डब्ल्यूएचओ की एक रिर्पर्ट में कहा गया कि देश में पांच में से एक डिलीवरी सिजेरियन ऑपरेशन के जरिए की जाती है। ज्यादातर आॅपरेशन अस्पताल द्वारा पैसे कमाने के लिए किए जाते हैं। साल 2007-08 में नौ एशियाई देशों में किए गए सर्वे में पाया गया कि सिजेरियन में 27 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। 

मैंने 1996 में जयपुर के मुख्य अस्पतालों का सर्वे कर हकीकत जानी। यह सर्वे राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।


भारत के शहरी क्षेत्रों की महिलाओं में सिजेरियन डिलीवरी होने का खतरा दो दशकों पहले से आज तीन गुणा ज्यादा है। अगर महिला निजी चिकित्सक की देखभाल में हैं तो यह खतरा और भी ज्यादा है। इस बारे में विस्तृत अध्ययन नहीं किया गया है, लेकिन चिकित्सक पिछले बीस वर्षों में सिजेरियन डिलीवरी में तीन से पांच गुणा की वृद्धि का अनुमान लगाते हैं।

इतने सिजेरियन क्यों 

जयपुर में अप्रेल 1992 से अप्रेल 1993 तक एक वर्ष में 24 अस्पतालों में सिजेरियन की दर 16 प्रतिशत थी। ये आंकड़े राजस्थान वोलंट्री हैल्थ आर्गेनाईजेशन द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार हैं। सर्वेक्षण के अनुसार महिला तथा जनाना अस्पताल में अकेले सिजेरियन डिलीवरी की दर 23.09 प्रतिशत रही। इस अवधि में यह दर निजी अस्पतालों में 9.09 प्रतिशत रही। आखिर इसके कारण क्या रहे? क्या शिशु के जन्म के लिए सर्जरी का इतना दखल जरूरी था? क्या यह गर्भवती की इच्छा का परिणाम है? क्या यह परिवार तथा चिकित्सक की सलाह से किया जाता है? ऐसा लगता नहीं।

अक्षम और निरीह होते हैं ऐसे बच्चे 

महिला के गर्भाशय को चीरकर बच्चे का जन्म कराने को सिजेरियन डिलीवरी या सिजेरियन सैक्शन कहते हैं। गर्भावस्था के आखिरी माह में प्रसव के पूर्व गर्भस्थ शिशु को अगर किसी कारण खतरा उत्पन्न हो जाता है, तो सर्जन पेट चीरकर बच्चे का जन्म करा देते हैं।

अमेरिका में सिजेरियन पर किए गए एक शोध के अनुसार इस विधि से जन्मे बच्चे संघर्ष में अक्षम और निरीह होते हैं। प्राकृतिक जन्म के दौरान होने वाली प्रक्रियाओं के फलस्वरूप बच्चे के शरीर में केटाकोलीमिन नाम के अन्तः स्रावी रसों के स्राव से बच्चे के फेफड़े की कार्यक्षमता, हृदय और मस्तिष्क के रक्त प्रवाह में जो व्यापक परिवर्तन होते हैं, वे नवजात को जन्मोपरान्त सम्भावी विपदाओं से जूझने के योग्य बनाते हैं। सिजेरियन डिलीवरी में प्रतिरोधात्मक शक्ति का एक ओर जहां अभाव हो जाता है वहीं यह एक बड़ा ऑपरेशन होने के कारण महिलाओं को व्यर्थ का रक्त स्राव और संक्रमण जैसी पीड़ा भुगतनी पड़ती है।

तो फिर क्यों करना पड़ता है ऑपरेशन  

सिजेरियन के अधिक मात्रा में होने के कई कारण हैं, लेकिन इसका मुख्य कारण जो चिकित्सक मानते हैं वह है गर्भस्थ शिशु को खतरा (फीटल डिस्ट्रेस) अर्थात गर्भस्थ शिशु की हृदय गति में कभी और गड़बड़ी होना। शिशु के जीवन को लेकर ऐसी स्थिति में चिकित्सक सामान्य डिलीवरी कराने का खतरा मोल नहीं ले सकते। जनाना अस्पताल की अधीक्षिका डॉ. उर्षा शर्मा फीटल डिस्ट्रेस को ही सिजेरियन का मुख्य कारण मानती हैं। डा. शर्मा के अनुसार गर्भस्थ शिशु को पूर्ण रूप से ऑक्सीजन नहीं मिलने पर उसे खतरा उत्पन्न हो जाता है। ऐसी हालत में सिजेरियन के अलावा चिकित्सक और कुछ नहीं कर सकता।

गर्भ में शिशु के फेफड़े काम नहीं करते। कारण गभस्थ शिशु ऐम्नियोटिक फ्लूइड (तरल पदार्थ) में डूबा रहता है। इसके रक्त का शुद्धिकरण ऑक्सीजन प्लेसंटा (अपरा) के आर-पार मां के रक्त से होता है। फीटल डिस्ट्रेस में कईं कारणों से प्राणवायु ऑक्सीजन की कमी होने पर शिशु की हृदय गति में परिवर्तन आ जाता है और उसकी जान पर बन जाती है। ऑक्सीजन की कमी के कारण बच्चे का दिमाग भी क्षतिग्रस्त हो सकता है।

तो क्या बिना बात ही कर दी जाती है चीरफाड़ 

फीटल डिस्ट्रेस निश्चित रूप से सिजेरियन का संकेत है, लेकिन गर्भस्थ शिशु की हृदय गति को और अन्य जांचों के साथ सही तरीके से देखा जाना चाहिए। अमरीका में सिजेरियन के चलन ने शोधकर्ताओं की नींद उड़ा दी। उन्होंने इस पर शोध किया। सिजेरियन से जन्में हर बच्चे का पूर्ण परीक्षण किया गया, जिसमें ऑक्सीजन की कमी, गर्भस्थ शिशु की हृदय गति में कमी और परिवर्तन से उत्पन्न खतरे के कारण ऑपरेशन किया गया था। रक्त परीक्षण आदि के बाद आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए कि ऐसे जन्में बच्चों में से पचास प्रतिशत में ऑक्सीजन की कमी नहीं थी। इतना बड़ा आपेशन व्यर्थ ही किया गया। इसी तथ्य के आधार पर और जांच की गई। इससे जो तथ्य सामने आए उनका निष्कर्ष था कि प्राकृतिक जन्म ही शिशु-माता और उनमें पारस्परिक सम्बन्धों के लिए श्रेष्ठ है। शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रसव की प्रगति के साथ-साथ बच्चे के शरीर में उसकी एड्रीनल ग्रंथियों से केटाकोलामिन विशेषकर नोरएड्रोलिन नामक हारमोन का स्राव उत्तरोत्तर अधिक मात्रा में होता है। नोरएड्रोनिल के प्रभाव से बच्चे के शरीर में निम्न परिवर्तन होते हैं।

नेचुरल प्रोसेस 

फेफड़ों के वायुकोषों में व्याप्त तरल पदार्थ बनना बन्द हो जाता है और इसमें स्थित पदार्थ अवशोषित हो जाता है, फलतः वायुकोष जन्म लेने पर खाली मिलते हैं। साथ ही फेफड़ों का लचीलापन बढ़ जाता है और वायु लेने वाले मार्ग खुल जाते हैं।
हृदय और मस्तिष्क की रक्तवाहिनी नलियां विशेष रूप से चौड़ी हो जाती हैं और शरीर के शेष सभी भाग की नलियां संकुचित हो जाती हैं। इसके फलस्वरूप शरीर के अन्य भागों की अपेक्षा हृदय और मस्तिष्क में रक्त वितरण की मात्रा बढ़ जाती है ताकि इन नाजुक भागों पर ऑक्सीजन की कमी का असर न पड़े। शिशु की हृदयगति धीमी पड़ जाती है ताकि उसके स्वयं के कार्य के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता भी कम हो जाए। फलस्वरूप नवजात शिशु के फेफड़े जब तक कार्य करना शुरू न करें, तब तक ऑक्सीजन की कमी के दौरान हृदय को कोई क्षति नहीं होती।

शिशु के शरीर में संचित ऊर्जा के सभ स्रोतों से रूपान्तर होकर ग्लूकोस और फेटी एसिड्स रक्त में इकट्ठे हो जाते हैं ताकि विपदा के समय ईंधन और समुचित भण्डार सहज ही उपलब्ध हो। जिन बच्चों को गर्भ के दौरान उत्पन्न खतरों से बचाने के लिये ऑपरेशन किया गया, अगर उन्हीं से बचने की क्षमता ऑपरेशन से जन्म लेने के कारण कम हो जाए, तो ऑपरेशन का प्रयोजन ही काफी हद तक विफल हो गया।

संतोकबा दुर्लभजी अस्पताल के वरिष्ठ शल्य चिकित्सक तथा राजस्थान वोलंट्र हैल्थ आर्गेनाइजेशन के सलाहकार डॉ. एसजी काबरा सिजेरियन के कईं कारणों में से एक कारण जयपुर के निजी अस्पतालों में वरिष्ठ चिकित्सकों (पीयर बॉडी) का जांच दल नहीं होना मानते हैं। 

डा. काबरा के अनुसार अगर सिजेरियन कराने के हालात उत्पन्न होते हैं तो इसका निष्कर्ष इस जांच दल का ही हो, लेकिन ऐसा नहीं होता। सिजेरियन का निर्णय एक ही चिकित्सक का होता है जो कई कारणों से सही नहीं हो सकता। संतोकबा दुर्लभजी अस्पताल में यह पीयर बाडी कार्यरत है।

 उनके अनुसार 1972 में अस्पताल शुरू होने के समय सिजेरियन की दर पांच प्रतिशत थी लेकिन यह दशक के अंत में बढ़कर दस प्रतिशत हो गई। वहीं हर तेरह प्रसव में से एक सिजेरियन था और 1985 से 1989 की अवधि में ये तेईस प्रतिशत तक जा पंहुचा। ये आंकड़े चौंकाने वाले थे। अस्पताल प्रबन्धन ने इसको गम्भीरता से लेते हुए पीयर बाडी की स्थापना की और उसके परिणामस्वरूप सिजेरियन का प्रतिशन 1990 से घटकर 16 तथा 1992 में 12 प्रतिशत रहा। अब यह 12 प्रतिशत पर स्थिर है।

जयपुर महिला चिकित्सालय की अधीक्षिका डा. तारा माथुर के अनुसार चिकित्सालय में सिजेरियन का फैसला पांच चिकित्सक करते हैं, जो कि अलग-अलग यूनिट से होते हैं जबकि जनाना अस्पताल की अधीक्षिका डा. उर्क्षा शर्मा के अनुसार जनाना अस्पताल में दो चिकित्सक यह निर्णय करते हैं।

सिजेरियन का बढ़ना चिन्ताजनक

सरकारी अस्पतालें में सिजेरियन का बढ़ना चिन्ताजनक है क्योंकि यहां चौबीस घंटे चिकित्सक मौजूद रहता है जबकि निजी अस्पतालों में ऐसा नहीं होता। डा. तारा सिजेरियन के बढ़ने पर अनभिज्ञता जाहिर करती हैं। वे कहती हैं कि हमारे पास गम्भीर स्थिति में भेजे हुए केस आते हैं और इनमें सिजेरियन करना आवश्यक हो जाता है। डॉ. उषा सिजेरियन की दर पन्द्रह प्रतिशत बताती हैं, दूसरा अन्य चिकित्सक द्वारा भेजे गए केस के बारे में वे भी बताती हैं।

पैसे का खेल

सिजेरियन की बढ़ोतरी में जो मुख्य कारण सामने आता है वह है पैसे का। चिकित्सा विज्ञान में प्रगति के साथ सुरक्षा के लिए सर्जरी अधिकाधिक प्रयोग में लाई जा रही है, लेकिन गर्भस्थ शिशु की सुरक्षा के लिए शुरू हुई सिजेरियन प्रणाली आज व्यवसाय बन गई है। चिकित्सक पैसे को सिजेरियन का एक बड़ा कारण मानते हैं। निजी अस्पतालों में सिजेरियन के बहाने मोटी रकम वसूली जाती है। मरीज ज्यादा दिन अस्पताल में रहता है और इसी हिसाब से बिल बढ़ता जाता है।

एक सिजेरियन के बाद भी सिजेरियन हो ऐसा नहीं है 

एक सिजेरियन का मतलब बार-बार सिजेरियन ही होने की बात गलत साबित हुई है। डा. काबरा के अनुसार एक सिजेरियन के बाद सामान्य प्रसव सम्भव है। डा. माथुर कहती हैं, एक डिलीवरी के बाद सामान्य प्रसव की 70 प्रतिशत सम्भावना है। मोनीलेक अस्पताल की प्रसूति रोग विशेषज्ञ डा. राधा नायर कहती हैं कि सामन्य प्रसव के बाद भी सिजेरियन करना ही पड़ता है, जैसे बच्चेदानी का मुंह संकरा होना आदि। डा. नायर के अनुसार कईं बार महिला की घबराहट के कारण भी सिजेरियन करना पड़ जाता है। कुछ महिलां प्रसव के अन्तिम क्षणों में इतना जयादा घबरा जाती हैं कि उनकी बेहोशी की सी हालत हो जाती है। ऐसी स्थिति में सामान्य प्रसव सम्भव नहीं है।
जहां तक महिला के आग्रह पर सिजेरियन करने की बात है इसे चिकित्सक गलत बताते हैं। कईं बार प्रसव पीड़ा सहन नहीं कर पाने की सिथति में महिला चिकित्सक से सिजेरियन के लिए कह सकती है, किन्तु अधिकतर चिकित्सक यही कहते हैं कि महिला के कहने पर हम सिजेरियन नहीं करते।

मुहूर्त देख प्रसव करवाना

सिजेरियन का एक छोटा किन्तु विचित्र कारण जो प्रकाश में आता है वो है मुहूर्त देखकर प्रसव करवा देना। परिवार के कुछ लोग शुभ मुहूर्त में प्रसव करवाने के इच्छुक होते हैं, अतः शुभ अवसर देखकर सिजेरियन करा दिया जाता है। डा. तारा कहती हैं कि ऐसा हो सकता है, लेकिन बहुत कम। वे कहती है, कईं बार जब एक सिजेरियन हो जाता है तो दूसरी बार भी सिजेरियन की सम्भावना बनी रहती है या सिजेरियन होना जब निश्चित हो जाता है तो शुभ अवसर देखकर सिजेरियन करा दिया जाता है। 

एक बड़े चिकित्सालय की महिला चिकित्सक के अनुसार सिजेरियन केस बढ़ने का कारण चिकित्सकों द्वारा किसी तरह का खतरा नहीं उठाना भी है। चिकित्सक जरा से खतरे पर ही सिजेरियन कर देते हैं।
महिला चिकित्सकों के अनुसार छोटे परिवार का चलन भी सिजेरियन को बढ़ावा दे रहा है। वे कहती है। कि आजकल अमूमन लोग छोटा परिवार ही चाहते हैं। एक या दो बच्चों पर ही संतुष्टि करने वाले इस दौर के लाग महिला तथा बच्चे के साथ किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहते।

मुकदमेबाजी भी एक कारण 

एक और बड़ा कारण इसी विषय में जो सामने आता है वो है मुकदमेबाजी का। डा. राधा नायर इसे सिजेरियन का सबसे बड़ा कारण मानती है। किसी परिस्थिति में यदि महिला की मृत्यु हो जाती है तो इसके परिजन चिकित्सक पर यह कहकर मुकदमा कर सकते हैं कि फलां चिकित्सक की लापरवाही के कारण ही महिला की मृत्यु हुई, लेकिन जयपुर व भारत में लिटीगेशन कम ही देखने को मिलता है। विदेशों में इसका प्रभाव ज्यादा है।

scan-20

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s